Saturday, April 16, 2016

ऐ मेरे गरीब नवाज...

लखनऊ निरंकारी सत्संग में आदरणीय महात्मा राम लाल जी एवं सुल्ताना जी के भक्ति गीत साध संगत अकसर सुनती है...बाबा जी ने इन दोनों महात्माओं को ऐसी कला बख्शी है कि जब भी ये दोनों महात्मा अपने गीतों से संगतों को निहाल करते हैं तो संगत उन गीतों में डूब जाती है ...

दास ने लगभग छः महीने पहले महात्माओं के इस गीत को रिकार्ड किया था...आज निरंकारी संगत नाम से नया ब्लॉग शुरू किया है तो सोचा कि इसे यहां शेयर कर देते हैं...

दोनों महात्मा पुरातन, पूर्ण विश्वासी, विनम्र और हमेशा निमाने बन के रहते हैं...गुरू की शिक्षा के अनुरूप...इन के गीत तो गीत, इन्हें देख कर ही इन के विश्वास से ही दास जैसे कमज़ोर गुरसिखों को बहुत ज़्यादा प्रेरणा मिलती है ..

अब आप इन से ही रहमतें लीजिए...
 

अभी अभी देखा तो देखा कि सत्संग वाले व्हाट्सएप ग्रुप पर यह एक सुंदर सा संदेश आया हुआ है ..आप से शेयर करने की इच्छा हुई...

अच्छा, महांपुरुषो, धन निरंकार जी...हो सके तो लिखना यह निरंकारी संगत ब्लॉग का प्रयास कैसा है...दास को तो यह भी नहीं पता कि यह निरंकारी मिशन के आदेशों के मुताबिक है भी कि नहीं, क्या हम ऐसा कुछ ब्लॉग सत्संग के ऊपर लिख सकते हैं?....दास को नहीं पता...किसी से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई सुबह से...बस, दोपहर में मां ने देखा तो उन्होंने महात्मा गुरसेवक जी के बारे में पढ़ कर कहा कि इस तरह से लिखना बहुत अच्छी बात है, सब का अकीदा पक्का होगा...मां तो मां ही होती है, आप की भी फीडबैक ज़रूरी है ...ताकि इस ब्लॉग को आगे भी चालू रखा जा सके...जहां तक इस सत्संग ब्लॉग में क्या शेयर करना है, क्या नहीं ...क्योंकि यह सब पब्लिक डौमेन में होता है, उस के लिए तो self-restraint रखना  होगा...यह तो पक्का है ही...

अच्छा, महांपुरूषो, कभी कभी सन्नाटा तोड़ दिया करो... धन निरंकार जी..

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